तूफ़ान उठता है 
मेरे सीने में भी 
मगर तेरे शहर की 
हवाओ से अलग है वो


रौशनी होती है
मेरे दिल के कोने में भी
मगर तेरे शहर के
उजाले से अलग है वो


टपकती है बूंदे
मेरे जिस्म और आँखों से भी
मगर तेरे शहर की
बरसात में टपकती छत से अलग है वो


बुझाई जा ना सकी  मुझसे
धधकती हुई आग है वो
रहने दो इस हाल में अभी
मुँह खुलते ही  वर्ना
जल के राख हो जायेगा वो

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