समर्पण करना चाहता हूँ , 

तुमको 
आँसू , वेदनाएँ 
असहाए पीड़ा ,
भूख 
ईर्ष्या-द्वेष 
और रिश्तो में छिपायी हुई 
नफरत,
ठहाको के पीछे,
खड़े ,
शोषण के विचार । 
मानसिक अपंगता,
वैचारिक कुरूपता ,
के सिवाय मात्र,
मिल गये थे जो ,
कुछ क्षण । 
एकांतवास के ,
आत्मचिंतन के,
एक रूप के 
प्रेम के   । 
समर्पण करना चाहता हूँ , 
तुमको, केवल तुमको । 

                                                          सुशील ………