सुबह का समय 

सूरज, सवेरे सुबह ८ बजे आकर ही दफ्तर खोल देता है और सबसे पहले ताजा पानी भरने का काम करता है। अपनी पेन्ट्री को साफ़ व्यवस्थित करने के बाद अध्यापको के फैकल्टी रूम में सभी सामान को ढंग से रखता है, पानी की बोतले, गिलास आदि। ८ :४० मिनट पर अध्यापक लोग आने प्रारम्भ हो जाते है , अभी अपना सामान रख भी नहीं पाते की ठिठुरती ठण्ड में सूरज की खोज आरम्भ हो जाती है। पहली निश्चित आवाज ही सूरज को उसके दिन की दिशा निर्धारित कर देती है। और सूरज जैसे तैयार हो जाता है एक कर्म-युद्ध के लिए, एक उजाला फैलाने के लिए, बिना किसी भेदभाव के सभी को प्रकाश देने के लिए।     

 “भैया! मेरे लिए एक गिलास पानी लेते आना, थोड़ा कोसा सा ” जनवरी महीने की सुबह ८ :४५ बजे एक आदेशात्मक आवाज उभर कर आती है। पहली आवाज पूरी भी नहीं हुई थी एक और आवाज जुड़ जाती है ” भैया ! मेरे लिए एक कप चाय का बना दो ” । फिर जैसे ही चाय और गर्म पानी टेबल पर आ जाता है तो तीसरी और चौथी  आवाज भी साथ साथ अपना आर्डर बता देती है। भैया ! एक काठी  रोल , एक सैण्डविच और एक कॉफी लेते आओ। थोड़ा जल्दी कर देना मेरे लेक्चर की १५ मिनट्स अभी बाकी बची है, आज सुबह नाश्ता भी नहीं किया।  जी साहिब ! कहकर सूरज बहार चला गया । 

सूरज बाहर निकलकर अभी घडी में समय देख ही रहा था कि तभी दूसरे साहिब की घंटी बज जाती है और ठिठुरती ठण्ड में दौड़कर साहिब के दफ्तर में जाता है और प्रार्थनापूर्वक साहिब की टेबल के सामने खड़ा हो जाता है । 

 साहिब : कहाँ रहता है तू ? कितनी देर से आवाज लगा रहा हूँ , एक कप चाय का बना और ये जो पेपर रक्खे है इनकी २० -२० फोटो कॉपियाँ लेकर जल्दी आ अभी १५ मिनट्स के बाद मेरी क्लास है। ये नोट्स विद्यार्थियों को बाँटने है आज उनका टेस्ट लेना है ।  

सूरज:  जी साहिब ! 

सूरज अभी पूर्णतया: बाहर भी नहीं निकला था की बाहर वाशरूम से आते हुए एक अध्यापक ने अपनी वेश-भूषा को सही करते हुए बोला, अरे भैया अभी आप यहीं घूम रहे हो मेने आपसे अपने लिए मार्कर और डस्टर लाने के लिए कहा था ? ले आये हो ? 

सूरज:  जी साहिब वो तो कल ही आपकी टेबल पर रख दिए हुए है। 

अध्यापक : चलो जाओ, ठीक है

 सूरज चाय बनाने के लिए पेंट्री में चला जाता है जो की स्कूल के प्रबंधक ने स्टाफ रूम के साथ ही बनवा दी थी ताकि अध्यापको का जो समय बचे वो विधार्थियो के लिए सदुपयोग होता रहे। अभी सूरज चाय बना ही रहा था कि एक मैडम की आवाज ने उसका उसका सन्नाटा तोड़ दिया । “भैया ! मेरा खाने का सामान ले आये ? जी मैडम आया । चाय का कप देकर जैसे ही सूरज मुड़ा, साहिब बोले … फोटो कॉपी करवा लाया है ? ५ मिनट्स बचे अभी क्लास शुरू होने में और तू इधर ही घूम रहा है । जी साहिब ! अभी लाया बोलकर सूरज दफ्तर से बाहर निकला तो सीधा फ़ोटोस्टेट की दुकान पर चला जाता है। वहां से फोटो कॉपी करा कर वो सीधे अध्यापक के पास चला आता है पर तब तक अध्यापक अपनी क्लास में चला जाता है। क्लास कहाँ लगी है पता करने के बाद  उन नोट्स को देने के लिए क्लास में चला जाता है । दरवाजे पर दस्तक देकर जैसे ही अंदर प्रवेश की प्रार्थना करता है तो साहिब की आँखे गुस्से और सवाल से देखती है जैसे पूछ रही हो की टेस्ट में विलम्भ का उत्तरदायी तू ही है। एक सम्मान के भाव के साथ जैसे ही क्लास से बाहर निकलता है तो बरामदे में आकाश से मुलाक़ात हो जाती है ।  दोनों एक-दूसरे को देख मुस्कराकर हाल चाल पूछने के लिए दिवार का सहारा लेकर खड़े होने का प्रयास कर ही रहे थे कि सुपरवाइजर पवन सिंह की शिकारी नजरे उन पर पढ गयी। और बस अब क्या था कम से कम ५ मिनट्स की डांट के साथ काम न करने की फजीहत वाली स्थिति अलग । 

पवन सिंह :  तुम दोनों को सुबह ही गप्पे मारने का समय मिल गया, कामचोर कही के। साहिब लोग काम बताते है तो इधर उधर भाग जाते हो, ज्यादा काम का बहाना बनाते हो।  

सूरज और आकाश अपना सा मुँह लेकर अपने स्थान की और चले जाते है, जैसे उनका मिलना, बात करना कोई पाप हो गया है। दबे से मन के साथ स्टाफ रूम से अध्यापको द्वारा रखे खाली कपो को टेबल्स से उठाकर पेंट्री में लेजाकर साफ़ करने लग ही रहा था की आवाज आई की ” सूरज ये फ़ाइल आप  नरेश सर के ऑफिस में देकर आओ, अभी । सूरज ने जी हाँ ! में सर हिला दिया । कप व अन्य सामान को सही जगह रखकर जैसे ही फाइल पकड़े बाहर निकला तो उसके फ़ोन की घंटी बजी। फ़ोन उठाया तो पता लगा की दूसरी और से उसकी मित्र रेखा बोल रही है जिसके साथ उसकी शादी तय होने ही वाली है । 

रेखा: कितनी देर से तुमको फ़ोन कर रही हूँ , फ़ोन क्यों नहीं उठाया? तुम्हे पता है कितना जरुरी काम था और मैं फ़ोन कर कर के परेशान हो रही हूँ अलग से। फिर तुम्हारा क्या फायदा अगर तुम मेरे अच्छे बुरे वक़्त में साथ नहीं दोगे ……………………                   

सूरज अभी फ़ोन सुनते हुए आधा ही रास्ता तय कर पाया था और उसको अपनी मज़बूरी बताने की और पूछने की कोशिश ही कर रहा था कि ४ वे तल पर उसके मोबाइल फ़ोन का सिग्नल टूट गया और बात अधूरी ही रह गयी ।  दुबारा, फ़ोन को इधर उधर कर फ़ोन में सिग्नल ढूंढने की नाकाम कोशिश की लेकिन असफल  होकर नरेश जी के दफ्तर की और बढ़ गया। पहुंचकर देखा तो दरवाजे पर ताला लगा मिला, पता लगा की सर मीटिंग में गए हुए है। रुके रहने और वापिस फाइल लेकर जाने की कशमकश में फसकर ४-५ मिनट्स बाद भारी कदमो से अपनी पेंट्री की और चल पड़ता है । 

दुबारा से रेखा को फ़ोन करना चाहा तो नेटवर्क बिजी ही आता रहा। वापिस अध्यापक जी के पास आकर फाइल वापिस की तो साहिब ने उन फाइल्स का महत्व मीटिंग्स के लिए बता कर, काम न कर पाने का जैसे रिजल्ट घोषित कर दिया हो । वहां से जीरो नंबर लेकर चला तो पेंट्री में आकर खड़ा ही हुआ था कि मैडम की आवाज आई। 

मैडम: ” भैया ! आपसे चिप्स, स्प्रिंग रोल  और कोक लाने को बोला था, आप लेकर नहीं आये। सुबह से नाश्ता भी नही किया, बहुत भूख लग रही है अगर आपको लाना नहीं था तो मना कर देते । मै अपने आप चली जाती, इतना भी कोई कैंटीन दूर नहीं है”           

सूरज: जी मैडम ! अभी लाया वो सर के काम से चला गया था, अर्जेंट था , अभी लाया जी बस दो मिनट्स में। 

सूरज ने अभी पेंट्री से पैर बाहर भी नहीं रखा था कि सर की आवाज ने पैरो को रोक दिया। अरे सूरज! २ -३  कप चाय के बना दो भाई.…गला सुख गया बोलते बोलते, रमेश सर भी आ गए है ।  जी साहिब ! की आवाज के साथ सूरज ने उत्तर दिया। बस सर अभी ५ मिनट्स में मैडम का आर्डर लाना है कॅन्टीन से। आया साहिब जी बस अभी ।   

सूरज दौड़कर कैंटीन पहुँचा और अपना आर्डर लेने लगा तो, स्प्रिंग रोल को गर्म देने के लिए प्रार्थना कैंटीन मालिक से की तो उसने अनसुना कर दिया। और उसकी भी क्या गलती ये ही तो है ११ बजे का टाइम जब उसकी कैंटीन पर सबसे ज्यादा भीड़ होती है। विद्यार्थी चाय और रिफ्रेशमेंट लेने के लिए आते है। चारो और का वातावरण देखकर सूरज आर्डर लेकर मैडम को देता है तो मैडम के अनमने वयवहार से रूबरू होता है। 

मैडम: भैया ! ये स्प्रिंग रोल्स तो ठंडे है आप इनको गर्म करके लाओ । 

सूरज स्प्रिंग रोल्स को ओवन में गर्म कर के लाकर दे देता है , तो मैडम भी एक थका सा.………  थैंक्यू भैया बोलकर उसके काम पर अपनी मोहर लगा देती है। सूरज अपनी पेंट्री को चल देता है ये सोचते हुए की जनवरी के महीने में स्प्रिंग रोल गर्म और कोक चिल्ड क्यों चाहियें ? शायद वो इसके स्वाद को समझना नहीं चाहता था तो बचे हुए कप और प्लेट्स को साफ़ करने में लग गया। इसी दौरान  सर की २ -३ कप चाय भी बना दी और उनको दे आया। सर की खाली पानी की बोतल उठाई और गर्म पानी के लिए पूछा, सर ने  कोसे पानी से भर देने को कहकर चाय की चुस्की ली , सूरज ने बोतल कोसे पानी से भर के उनकी टेबल पर रख दी। स्टाफ के लोगो की सुबह की चाय का वक़्त ख़त्म होने लग रहा था और दोपहर में खाने की हलचल प्रारम्भ हो गयी थी।     

 दोपहर का समय 

 लंच टाइम होते ही अध्यापक लोग अपना खाना पेंट्री में रखे ओवन में गर्म करने लगते हैं। कुछ साहब लोग अपना टिफ़िन लाते है खाना गर्म करते और चले जाते। ये सिलसिला रोज ही रहता । सूरज भी पेंट्री के बाहर खड़ा रहता कि कोई उसकी जरुरत ना पड़ जाए। लेकिन बड़ी अजीब बात है की जिस गर्मजोशी से उसको चाय लाने के लिए बोला जाता उतनी ही गर्मजोशी से सब अपना खाना अपने आप गर्म कर के ले जाते। शायद ही कोई कभी पूछता हो की आज तूने चाय पी ? खैर ये सब तो चलता है. …… इसी व्यवस्ता के बीच कोई आवाज मौन को भंग करती हुई आती है. ………

मैडम: ” भैया आज मैस में क्या बना है ? 

सूरज: मैडम जी …… कड़ी , चावल, आलू की सब्जी ।           

मैडम: भैय्या जी ! आप एक टिफ़िन में कड़ी चावल लेते आओ 

और इसके साथ ही सूरज २० रुपए लेकर मैस से खाना लेने चला जाता है। अभी खाना भी नहीं लिया था की मोबाइल पर सर की बेल बजी और बोला गया की भाई आप कैंटीन से परांठे लेते आना। जी साहिब कहकर सूरज ने मोबाइल फ़ोन रख दिया।  खाना और परांठा लेकर पहुंचा तो जो लोग खाना खाकर बैठे थे बोले सूरज भाई। …….चाय बनाओ। अभी सूरज चाहकर भी नहीं बोल पाया की उसको भी भूख लगी है और २ बजकर ३० मिनट्स हो चुके हैं । खैर चाय देते हुए उसने कह दिया कि साहिब जी मै अभी खाना खाने जा रहा हूँ। साहब ने बिना किसी भाव के सिर हिला दिया। 

सूरज, इस ठिठुरती सर्दी में, धूप की तलाश में ऑफिस का कोई कोना ढूंढता तो साहब लोग उसे देखते ही कोई ना कोई काम ढूंढ ही लेते है और वो चाहकर भी धूप में खड़ा नहीं हो सकता। कई बार सोचता है कि उसको क्यों थोड़ी देर धुप नहीं मिल सकती। क्यों उसे देखकर इन साहबो को काम याद आता है? क्या इनके घर पर भी नौकर है जो इनको पानी लाकर देते होंगे या थोड़ी थोड़ी देर बाद चाय पिलाता होगा ? क्या अपनी टेबल पर पानी की बोतल होना और चाय पीना बड़े होने का प्रतीक है ? क्या ये साहब लोग अपने खाने पीने का ही ध्यान रखते है ? पी-ओन का नहीं ? क्या पी-ओन  को चाय की जरूरत और भूख नहीं लगती ? इसी कश्मकश में दोपहर ढलने लगती है। 

एक ३ बजे की चाय और बची है जब सभी अपनी अपनी पसंद की चाय पीना पसंद करते है । कई बार तो फ़ोन पर ही बोल दिया जाता है , सूरज ४ कप चाय कैंटीन से लेते आना पैसे में दे दूंगा और जब सूरज अपने पैसो से चाय ले आता है तो साहब जल्दी जल्दी में चाय के साथ पैसो को भी भूल जाते है । अब शाम के चार बजने  वाले है, स्टाफ वाले घर जाने की तैयारी करने लगते हैं और बाहर सूरज भी ढलने लगा है लेकिन अपना सूरज अभी भी दफ्तर में साहब लोगो का टेबल से सामान उचित रूप से रखकर सफ़ाही कर रहा है। झाड़ू – पोचा मारने वाला साथ में फर्श को साफ़ कर रहा है । दोनों अपने आप में व्यस्त जाने क्या गुन गुना रहे है। कमरे की सफ़ाई के बाद सभी लाइट्स के स्विच बंद कर सूरज अँधेरे से निकल कर अपने कमरे की और एक उत्साह और तैयारी के साथ कल की उम्मीद लिए दफ्तर और साहब लोगो को ख़ुशी-ख़ुशी सीऑफ कर गुनगुनाते हुए चला जाता है।                      

                      

सुशील कुमार 


Moral: please give respect to each and everyone, whether that’s work level, is small or big. Talk sometimes to your peon ask him his progress, about family or related things, not ask only tea or other related items always. Take care sometimes of him also. After all, he is also a human being.


Disclaimer : ये कहानी किसी व्यक्ति विशेष पर आधरित नहीं है अगर कुछ तथ्य किसी व्यक्ति विशेष के साथ मिल जाते हैं तो ये मात्र एक संयोग होगा ।