ज़रा सा आहत होते ही 
स्वभाव बदल जाता है 
वो कहता है की तू मेरा है 
और आलम ये की हर चोट पर 
वो बहुत दूर चला जाता है

मुझे मेरी मै से मतलब 
तू करीब हो या रिश्ते में
मेरी सोच मेरे कदम 
तू फाँसले बना के रख

तेरी ख्वाइशों तेरे गमो का 
पनाहगार नहीं 
मैं सकून बेचता हूँ यहाँ
रंगीन लिबास ओढ़कर 

मिलता हूँ हर शाम 
आम-ए -ख़ास से
मुझे अपना समझने की भूल ना कर
मुखोटे इतने की खुद को भूल गया 
तुझसे  मिलूं कोनसा मुखोटा डालकर 




डा० सुशील कुमार