ये सवाल किसी कौम या मज़हब का नहीं

ए वक़्त 

ये सवाल इंसानियत के वज़ूद का है 

इस फ़िज़ा में क्यों 
औरते -बच्चे महफूज़ नहीं ?
हैवानियत भी दर इस कदर 
क्यों शर्मशार हुई ?

खून के कतरे जमीं पे
मासूमों के गिरे 
और माओं के जिगर टुकड़े टुकड़े बिखर गए 

ऐ वक़्त 
तू इंसानो के भेष में किसे ले आया 
ये सदी तो बहुत महँगी हो गयी 
इंसानियत के वजूद के लिए ।