अब तो आदत सी हो गयी है ,
तुम बिन जीने की। 
रिश्तो के दर्द भी,
अंधेरो में पीने की। 
हर शाम गिरता हूँ ,
उठता हूँ ,
कभी तेरी यादों में ,
कभी मयखानों से,
हाल अच्छा है ,
रहने दे अभी ,
रंग कई देखने हैं
बाकी,
तेरी तस्वीर के अभी। 
ढूँढता हूँ,
काली श्याह रातो में ,
रंगीन चश्मे लगाकर । 
टपकता ना हो ,
रिश्तो का दर्द जिससे ,
जगह 
बाकी तो नहीं अभी। 
और आदत सी हो गयी है 
अब तो ,
तुम बिन जीने की,
रिश्तो के दर्द भी,
अंधेरो में पिने की ॥