खड़ा हूँ, 


सूखे पैड सा, 
मेरी शाखाओ पर रहने वाले 
सारी रात चिं -चिं और 
उछल -कूद करने वाले 
पक्षियों ने अब घोंसले 
दूर कहीं बना लिए है 
हवा के झोंके भी अब 
गर्दन घूमाने लगे है 
लक्क्ड़हारा सुनहरे-सूखे तने पर 
दबी आँखों से आस लगाए बैठा है
बची शाखायें भी 
रिश्तो सी टूटने लगी है 
हाथो सी शाखाओं पर 
कूदने वाली दोनों गिलहरी 
कभी -कभी जड़े कुरेदकर 
बचे हुए दानो को 
ले जाती हैं अपना समझकर
जिस जमीन में पला-बढा था 
आज उस मालिक ने कीमत 
लगा दी है 
लक्कड़हारे चारो और से घेरकर 
“अपना -अपना हिस्सा “
काटने लगे हैं 
ढलती शाम के साथ कुल्हाड़ियाँ 
और तेज चलने लगी है 
सभी जीव अपने -अपने घर को 
लौट रहे हैं 
पक्षियों के कलरव के बीच 
कुल्हाड़ियाँ और उनकी आवाजे 
चुप हो गयी है 
शायद, बूढ़ा पैड 
सो गया है 
हाँ ! सो ही गया है 
सदैव के लिए …… 
बूढ़ा पैड सो गया है ……… 



@सुशील के १७